Mr. Sonu Sharma is the founder of DYNAMIC INDIA GROUP (INDIA). An Author, Educator, Business Consultant and a successful Entrepreneur, he is a much sought-after speaker.

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चेन बनाने वाला बिजनेस

चेन बनाने वाला बिजनेस समझाने की कोशिश करता हूँ। आसान सी बात है - “If you want to become rich, find someone rich and do what he is doing then one day you will be rich too”. ये कहा है जेफ गेटी ने। ये समझने के लिए कोई पीएचडी करने की जरूरत नहीं, कोई एमबीबीएस होने की जरूरत नहीं है, कोई एमडी होने की जरूरत नहीं है। सिंपल फिलॉसफी है, आगे बढ़ने के तरीके सिंपल हैं घुमावदार नहीं। लेकिन सिम्पल तरीके समझना मुश्किल होता है। जेफ गेटी कहते हैं अगर आप पैसा कमाना चाहते हैं तो किसी ऐसे आदमी को देखें जो पैसा कमा रहा है। वह करें जो वह कर रहा है और एक दिन आपके पास भी पैसे आने शुरू हो जाएंगे। आसान है, इसको समझने के लिए पीएचडी की जरूरत नहीं। याद कर लीजिये - If you want to become rich, find someone rich and do what he is doing, then one day you will be rich too. एक दिन आपके पास भी वही सम्पन्नता होगी जो उसके पास है। जेफ गेटी यह भी बोलते हैं- ‘‘मैं 100 लोगों से 1-1 प्रतिशत काम कराना पसंद करता हूँ, बजाय इसके कि मैं 100 प्रतिशत काम करूँ।’’ यहाँ पर शुरू होती है नेटवर्क मार्केटिंग। ऊपर वाले कोट को लेकर चलते हैं If you want to become rich, find someone rich. देखिये अमीर लोग क्या करते हैं। अच्छा मुझे बताओ यह देश किसका है? और पत्नी किसकी है? यही प्रॉब्लम है तुम्हारी। देश तो हमारा है और पत्नी मेरी है। अच्छा मैंने पूछा ‘‘देश किसका है?’’ आपने बोला ‘‘हमारा’’। ‘‘पत्नी किसकी?’’ ‘‘मेरी’’। ‘देश मेरा है’ ऐसा एक ने भी नहीं कहा सिर्फ पांच सात लोगों को छोड़कर। क्यों मुंह से क्यों नहीं निकला? यही सबसे बड़ी प्रॉब्लम है। लेकिन अभी इसकी जड़ में जाने का समय नहीं है। सतह पर बात करते हैं। नेटवर्क मार्केटिंग में इसे कहते हैं ओनरशिप लेना। दोस्तों, लीडर्स इस बिजनेस में ओनरशिप नहीं ले पाते। उनको हमेशा लगता है यह बिजनेस किसी और का है। उन्हें लगता है यह बिजनेस मेरे अपलाइन का है। उन्हें लगता है यह बिजनेस कंपनी का है उसे कभी लगता नहीं यह बिजनेस मेरा है। मैं आपको बताना चाहूंगा 14 सितंबर 2005 को मैं इस बिजनेस में आया और मेरी टीम में एक व्यक्ति एसोसिएट हुआ और मैं उसी दिन से अपने आप को अपलाइन समझ रहा हूँ। मैंने अपने आप को डाउनलाइन कभी समझा ही नहीं। मुझे लगा कि एक भी व्यक्ति अगर जुड़ा है तो मैं अपलाइन हो गया हूँ। ऊपर की तरफ नहीं देखा नीचे की तरफ देखने की कोशिश की, बस। मुझे पता था कि सारा काम मुझे खुद को करना है, सेमिनार भी खुद करना है, ट्रेनिंग भी खुद करनी है, प्रोस्पेक्टिंग भी खुद करनी है क्योंकि मुझे पता था यह बिजनेस मेरा है। इसे बोलते हैं ओनरशिप। एक किस्सा सुनिए, एक लिमोजिन कार आकर रुकी और एक मजदूर वहाँ काम कर रहा था। लिमोजिन का दरवाजा खुला तो अन्दर से किसी ने बोला, ‘‘स्टीव कम इन साइड।’’ (स्टीव तुम अंदर आ जाओ)। स्टीव अंदर आया तो अंदर था जॉन जो उसकी कंपनी का प्रेज़िडेंट था। स्टीव तो मजदूरी करता था। ईंट उठा रहा था। जॉन ने स्टीव को लिमोजिन में बिठा लिया। अंदर उसने उसको कोल्डड्रिंक पिलाई, जूस पिलाया। टॉवल से उसका चेहरा साफ किया। आधे घंटे तक दोनों की डिस्कशन हुई। दोनों दोस्त थे। जब आधे घंटे बाद लिमोजिन का दरवाजा खुला और स्टीव उतरा तो वह फिर से ईंट ढोने के काम में लग गया और जॉन की लिमोजिन वहां से निकल गई। अब स्टीव के दोस्तों को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने बोला, ‘‘स्टीव! तुम्हारा दोस्त प्रेज़िडेंट?’’ उसने बोला, ‘‘हाँ, मेरा दोस्त है। हम 25 साल पहले एक ही कंपनी में काम करते थे। आज वह कहाँ है, मैं कहाँ हूँ?’’ उसने बोला, ‘‘पहले हम जिस कंपनी के लिए काम करते थे वहाँ मैं 1 घंटे में 200 रुपये कमाने के लिए काम करता था। मैं यह सोचता था मेरे पास इस घंटे में 200 कैसे आएंगे और वह सोचता था ‘मैं अब बड़ा आदमी कैसे बनूंगा’। दोनों की थिंकिंग में जमीन-आसमान का फर्क था। आज वह लिमोजिन में है और मैं आज भी मजदूर हूँ।’’ इससे आप कुछ समझे? मैं आपको एक और उदाहरण दूंगा तो आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे और यह सच्ची घटना है। सिविल सर्विसेस से दो लोग रिटायर हुए। दोनों ने एक साथ वॉलंटरी रिटायरमेंट ली। पहले व्यक्ति ने रिटायरमेंट लेने के बाद अपना बिजनेस सेट अप किया। बिजनेस के लिए उसने मेहनत की और वह चल पड़ा और उसकी कम से कम 200-250 करोड़ का टर्नओवर करने वाली कंपनी बन गई। एक दिन अचानक उसके पास इंटरव्यू के लिए एक आदमी आया। यह वही दूसरा व्यक्ति था जो सिविल सर्विसेज में उसके साथ काम करता था। उसने भी उसी वक्त वीआरएस ले लिया था। पहले ने दूसरे को पहचान लिया। वह बोला, ‘‘अरे! तू कैसे?’’ दूसरे ने कहा, ‘‘मैं तो जॉब कर रहा था कहीं। वहाँ से मामला गड़बड़ हो गया। अब इंटरव्यू दे रहा हूँ।’’ ‘‘हम तो एक साथ सिविल सर्विस में थे,’’ पहले ने कहा। दूसरे ने भी बोला, ‘‘हाँ, हाँ, एक साथ सिविल सर्विसेज में थे।’’ पहले ने दूसरे को नौकरी पर रख लिया। महीने - दो महीने बीत गए दूसरे को पहले की नौकरी करते-करते। दो महीने के बाद एक दिन जब सब चले गए तो एम्प्लायी ने अपने एम्प्लायर से - जो उसका मालिक था - कहा, ‘‘तुम्हें याद है 25 साल पहले हम एक साथ थे। तुम भी 2000 रुपये महीना कमाते थे और मैं भी 2000 रुपये महीना कमाता था। तब तुम भी नौकर थे और मैं भी नौकर था। हम दोनों नौकरी करते थे। आज तुम इस कंपनी के मालिक हो और मैं नौकर हूँ। कितने लकी हो।’’ उस आदमी ने बोला, ‘‘यह सच है कि मैं इस बारे में तुझसे बात करना नहीं चाहता था लेकिन तूने छेड़ दी है तो आज सुन। 25 साल पहले हम दोनों एक ही जगह काम करते थे। हम दोनों ही 2000 रुपये कमाते थे। तू तब भी नौकर था और आज भी नौकर है। मैं तुझे 25 साल पहले का एक वाकया सुनाता हूँ। एक दिन तू और मैं ऑफिस में से साथ निकले थे घर जाने के लिए। तुझे याद होगा रास्ते में जब हम एक-डेढ़ किलोमीटर पैदल चले आ रहे थे क्योंकि वहीं हमारा मेस था जहाँ हम जा रहे थे। और जब हम एक-दो किलोमीटर चल लिये तो मुझे अचानक याद आया और मैंने तुझसे कहा कि हम अपने कमरे का पंखा और लाइट चलता छोड़ आए हैं। तो चल कर उसको बंद कर देते हैं। तूने मुझसे कहा था कि ‘2 किलोमीटर वापस जाएंगे, 2 किलोमीटर फिर आएंगे, 4 किलोमीटर हो जाएंगे। 2 घंटा लग जाएगा। क्या फर्क पड़ता है?’ तू नही गया था। मैं गया था। लाइट बंद करके आया था। मैं तब भी मालिक था मैं आज भी मालिक हूँ। मैं तब भी खुद को मालिक समझता था। कर मैं नौकरी ही रहा था लेकिन मैं अपने आप को ओनर समझता था और मैं आज भी ओनर हूँ।’’ उसने आगे कहा, ‘‘तेरी जो फिलॉसफी है, तेरी जो थिंकिंग है वो तब भी एक एम्प्लायी की थी, आज भी एम्प्लायी की है। तूने अपनी थिंकिंग कभी चेंज नहीं की तो तू जिंदगी भर एम्प्लायी ही रहने वाला है।’’ It’s called taking ownership, my dear friend. दोस्तों, मैं आपको बताना चाहता हूँ कि सभी एम्प्लायी के लिए कम्पनी एक ही होती है। 1 जोड़ी 1000 रुपये, 2 जोड़ी 2000। 15770 में दो सूट मिलते हैं यह आप भी बताओगे मैं भी बताऊंगा। 14720 में तीन शर्ट 3 ट्राउज़र, यह आप भी बताओगे, मैं भी बताऊंगा। 11760 में 13 टाई आप भी बताओगे, मैं भी बताउगा। 5690 में कॉस्मेटिक, आप भी बताओगे मैं भी बताऊंगा। 14000 में साउंड सिस्टम, आप भी बताओगे, मैं भी बताऊंगा। आप में और मेरे में डाटा एक ही है। सब के पास जो डाटा है वह सब एक ही जैसा दे रहे हैं। लेकिन रिजल्ट में जमीन-आसमान का फर्क है। और इसी दिल्ली के अंदर डाटा डिलीवर हो रहा है। आप में से भी वही डिलीवर हो रहा है और मेरे मुंह से भी। सफल लोगों के मुंह से भी डाटा वही डिलीवर हो रहा है और असफल लोगों के मुंह से भी। किसी का पेआउट शानदार है, किसी का शानदार नहीं है। जिसका भी शानदार है एक बात तो तय है उसने बिजनेस के लिए ओनरशिप ले रखी है। उसे पता है यह बिजनेस मेरा है। जब मेरा होता है तब कंप्लेन खत्म हो जाती है। जब ‘मेरा’ का भाव होता है तो सजेशंस बढ़ जाते हैं, कंप्लेन बिल्कुल एलिमिनेट हो जाती है। मेरा होने के बाद आप इधर-उधर कंप्लेन नहीं करते। कभी प्रॉब्लम आती है तो उसको रफू करने की कोशिश ज्यादा होती है। लेकिन जब ‘मेरा’ का भाव नहीं होता, तब कंप्लेन होती है और फिर बहुत सारे नाटक होते हैं, यह ऐसा हो गया, वह वैसा हो गया। यह ठीक नहीं हुआ। हॉलिडे बंद कर दिया तुमने। एक आदमी आया मेरे पास बोला, ‘‘सर, हॉलिडे बंद हो गया।’’ मैंने कहा, ‘‘वाह! कहाँ थे अब तक? जब तक चल रहा था तब 6 महीने में तूने कितना बेचा था? चल वापस शुरू कर देता हूँ। अगले 6 महीने में कितना बेचेगा?’’ वह बोला, ‘‘नहीं, मैं तो ऐसे ही पूछ रहा था क्या बंद हो गई होलीडे?’’ एक्सक्यूज देखो। जब गोल सेट होते हैं और विजन सेट होता है तो फिर परफॉर्मेंस निकलती है। जब गोल भी नही होते और विजन भी नहीं होता है तब बहानेबाजी होती है, नाटकबाजी होती है, ड्रामे होते हैं और एक्सक्यूज निकलते हैं। बहुत पुरानी घटना है- रात को एक लड़का क्रिकेट खेल कर आया। वह दिल्ली कर्नाटक के बीच रणजी का मैच का खेल कर आया था और 40 नॉट आउट था। घर पहुँचा, सो गया। अगले दिन उसे फिर खेलना था। टीम संकट में थी। रात को ढाई बजे माँ ने जगाया, ‘‘उठ, तेरे पापा गुजर गए।’’ उसने अपने कोच को कॉल लगाया। कोच सिडनी में था। लड़के ने पूछा, ‘‘सर, मैं क्या करूं?’’ कोच बोला, ‘‘देख; लाइफ तेरी है। पिता तो नहीं रहे लेकिन जहाँ तुझे जाना है वह मौके बार-बार नहीं मिलेंगे।’’ अगले दिन वह लड़का सुबह ग्राउंड में गया। 90 प्लस स्कोर किया। टीम को संकट से बाहर निकाला और जाकर फिर क्रिमेशन ग्राउंड में अपने पिता का संस्कार किया। यह लड़का आज आपकी क्रिकेट टीम का कप्तान है। विराट कोहली की बात कर रहा हूँ। कोई बहाना नहीं है, कोई एक्सक्यूज नहीं है : आज जुकाम है; आज हमारे नल में पानी नहीं आ रहा, तो प्लंबर का काम हम करेंगे। ये सब वाहियात बहाने हैं। करेक्टर बिल्डिंग इम्पोर्टेंट है दोस्तों। अगर यह बिजनेस हम अच्छे से कर सकेंगे तो इसके पीछे बहुत बड़ा काम है। तो यह बिजनेस किसका है दोस्तों?