Mr. Sonu Sharma is the founder of DYNAMIC INDIA GROUP (INDIA). An Author, Educator, Business Consultant and a successful Entrepreneur, he is a much sought-after speaker.

Keep conected

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जुड़ते पुल

एक बार दो भाई जो पास-पास दो खेतों में रहते थे, में झगड़ा हो गया| पिछले 40 सालों से बिना किसी अनबन के पास-पास खेती करते हुए, मशीनें साझा करते हुए, मज़दूर बाँटते और प्यार से रहते हुए, ये पहली बार था की इतना झगड़ा हो गया था| और सालों का रिश्ता बिखर गया| बात एक ज़रा सी ग़लतफहमी से शुरू हुई और इतनी बड़ी हो गई की दोनों ने एक दुसरे को बहुत भला-बुरा कहा और हफ़्तों तक बात नहीं की| एक दिन जॉन के दरवाज़े पर एक दस्तक हुई| उसने दरवाज़ा खोला तो सामने बढई का सामान लिए एक आदमी खड़ा था| उसने कहा, “मैं कुछ दिनों के लिए काम ढूंढ रहा हूँ|” “शायद आपके पास मेरे करने लायक कोई छोटा-मोटा काम हो| क्या मैं आपकी कोई मदद कर सकता हूँ?” “हाँ,” बड़े भाई ने कहा| “काम तो है तुम्हारे लिए| नाले के उस पार वो खेत देखो| वो मेरा पड़ोसी है, बल्कि, मेरा छोटा भाई है| पिछले हफ्ते तक हम दोनों के बीच में एक चारागाह था पर इसने अपना बुलडोज़र लेकर नदी से यहाँ तक हम दोनों के बीच में ये नाला बना दिया| उसने ये मुझे चिढ़ाने के लिए किया होगा, मगर अब मैं इसे बताऊंगा| वहाँ कोठर में पड़ी लकड़ी देख रहे हो? मैं चाहता हूँ तुम मुझे एक बाड़—8 इंच ऊंची बाड़ बना के दे दो—ताकि मुझे उसकी जगह देखनी ही नहीं पड़े| कुछ भी, जिससे वो शांत हो जाए|” बढ़ई ने कहा, “लगता है मैं माजरा समझ रहा हूँ| मुझे कीलें और जगह बताएं जहाँ बाड़ लगानी है और मैं आपकी पसंद का काम कर के दे दूंगा|” बड़े भाई को कुछ सामान लाने के लिए बाज़ार जाना था तो उसने बढई को उसकी ज़रूरत का सामान दिया और दिन भर के लिए निकल गया| बढई ने दिनभर मेहनत से नाप कर, लकड़ी चीर कर, कीलें लगा कर काम किया| शाम ढले जब किसान वापस लौटा, तब बढ़ई ने बस अपना काम खत्म किया ही था| उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं और उसका मुंह खुला का खुला| वहाँ कोई बाड़ नहीं थी| वहाँ एक पुल था... नाले के इस पार से उस पार तक! काम बहुत सुन्दर था, हत्थे वगेरह के साथ- और उसका पड़ोसी, उसका छोटा भाई, उस पार से बाहें फैलाये उसके पास आ रहा था| “तुम भी कमाल के हो| इतना सब मेरे कहने सुनाने के बाद भी तुमने ये पुल बनवा दिया|” दोनों भाई पुल के दोनों किनारों से चल के पुल के बीच में मिले और एक दूसरे के हाथ थाम लिए| पलट के देखा तो बढ़ई अपने कन्धों पर अपना सामान ले कर निकल रहा था| “नहीं, रुको! कुछ दिन और रुक जाओ| तुम्हारे लिए मेरे पास और काम है,” बड़े भाई ने कहा| “मैं ख़ुशी से रुकना चाहता,” बढई ने कहा, “मगर अभी मुझे और कई पुल बनाने हैं|”